महायोगी स्वामी ईश्वरानन्द


गुरू को भगवान से भी पहला और ऊँचा स्थान दिया गया है, क्योंकि गुरू ही है, जो भगवान से हमारा परिचय करवाता है. सृष्टि के सत्य से हमारा साक्षात्कार करवाता है. सत्य, जिसके परत-दर-परत रहस्य जानने के लिए जीव बार-बार जन्म लेता है. तात्पर्य यह कि हमारा जन्म सफल हो, इसके लिए आवश्यक है कि गुरू का स्नेहसिक्त सान्निध्य हमें प्राप्त हो. किंतु समस्या यह है कि मायाजाल से भरे इस संसार में सच्चे गुरू से भेंट आसान नहीं है. प्रायः गुरू के नाम पर आडम्बर तथा कर्मकांड रचते बाबा और प्रवचन करते वाचाल स्वामियों से ही हमारी भेंट होती है, जिनकी शरण में अच्छा खासा समय और धन गँवाने के बाद हमें पता चलता है, “अरे, गुरू ने तो हमें ठग लिया!” कबीरदास जी ने कहा भी है, ‘लोभी गुरू लालची चेला दोनों खेले दांव, दोनों बूड़ैं बैठ पाथर की नाव.’ ऎसे में सच्चे गुरू की पहचान आवश्यक है, क्योंकि ‘बिन गुरू ज्ञान कहाँ से पावै’ और बिना ज्ञान के यह जीवन, यह संसार सब अंधकारमय है. इस अंधेरे से प्रकाश की ओर आने के लिए सच्चे गुरू की आवश्यकता है, ऎसे गुरू कि जो जीवन के रहस्यों से परदा हटाने में हमारी सहायता कर सके, हमें सही राह दिखला सके. तो प्रश्न है सच्चा गुरू कौन है? सच्चे गुरू को कैसे और कहाँ ढूँढें?

हमारे गुरू महायोगी स्वामी ईश्वरानंद जी का कहना है कि सच्चा गुरू ढूँढना बहुत कठिन नहीं है, यदि आप धर्म का सही-सही अभिप्राय समझते हों. धर्म का अर्थ हमने पूजन पद्धति और सम्प्रदाय को जान लिया है, जबकि वास्तव में परमात्मा को धारण करना ही धर्म है। जो भी व्यक्ति इस धर्म को धारण करता है तथा मन, वचन और कर्म से इसे निभाता है, वही सच्चा धार्मिक व्यक्ति है. गुरू के सन्दर्भ में भी यही बात कही जा सकती है कि सच्चा गुरू वही है, जो आडम्बर रहित हो तथा जिसकी कथनी और करनी दोनों एकरूप हों. केवल मुँह से अच्छी-अच्छी बातें बोलने अथवा दूसरों के सामने ओजस्वी प्रवचन देने मात्र से कोई गुरू नहीं हो जाता. हमारे धर्मग्रंथों में विचार से अधिक उनके सम्यक निर्वहन पर बल दिया गया है. हमेशा मन, वचन और कर्म की शुद्धता व पवित्रता सबसे बड़ा तप है, सबसे बड़ी साधना है. उनके अनुसार आडंबर की कोई आवश्यकता नहीं है। कथनी-करनी का एक होना या उसमें अंतर होना, यह बतला देता है कि व्यक्ति सच्चा है या ढोंगी. स्वामी ईश्वरानंद जी कहते हैं, ‘सच्चा गुरू वह है, जो परमात्मा को जानता है, और जो दूसरे को भी परमात्मा से मिलवा सकता है. हालाँकि स्वयं महायोगी स्वामी ईश्वरानन्द जी को सच्चा गुरू ढूँढने में जीवन के कई महत्वपूर्ण साल होम करने पड़े. सदगुरू की खोज में वह कहाँ-कहाँ नहीं भटके. बदरीनाथ से लेकर कन्याकुमारी तक और कटक से लेकर कामख्या तक, शायद ही कोई पीठ, मठ और आश्रम छूटा हो, जहाँ वह गुरू की खोज में न पहुँचे हों. इस दौरान मिले गुरुओं ने जो-जो तप, ध्यान, साधना और कर्मकांड बताये, सब किए, किंतु कहीं भी उस ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई, जो भगवान से उनका साक्षात्कार करवा दे.


महायोगी स्वामी ईश्वरानन्द जी की आपबीती अपने-आप में बड़ी ही दिलचस्प और अदभुत कथा है, जो न सिर्फ सत्य तक पहुँचने के उनके दृढ़संकल्प और उनकी लगन को बयान करती है, बल्कि ज्ञान पर प्रवचन देनेवाले बाबाओं और भगवान के निकट होने के नाम पर मठों-आश्रमों में सांसारिक सुख लूट रहे योगियों के भेद भी खोलती है.


महायोगी स्वामी ईश्वरानद जी का जन्म हरिद्वार आर्यनगर जवालापुर ,उत्तराखंड के एक सामान्य परिवार में हुआ था .वार में हुआ था, किंतु न जाने कैसे बचपन में ही उनपर एक अजीब सी धुन सवार हो गई- भगवान से मिलने की धुन. भगवान को जानने-समझने की धुन. किसी ने उनसे कहा कि भगवान से मिलने के लिए 4 बजे सुबह उठकर तालाब में स्नान कर मंदिर में पूजा करनी होती है, तो अगली ही सुबह वह 4 बजे सुबह उठकर तालाब में स्नान कर मंदिर पहुँच गए. उनका बालमन देखिए वह रोज सुबह-सुबह मन्दिर जाते और भगवान की मूर्त्ति से कहते, ‘भगवान, मैं आपके दर्शन करना चाहता हूँ. तुम अगर भक्त ध्रुव को मिल सकते हो, तो मुझे क्यों नहीं?’ कई दिनों की इस साधना के बाद भी भगवान तो प्रकट नहीं हुए, किंतु उनकी जिज्ञासा और लगन को देखकर कुछ बड़े-बुजुर्गों ने सलाह दी कि सोमवार को उपवास और व्रत रखो, भगवान शिव अवश्य दर्शन देंगे. बाल ईश्वरानन्द जी अब सोमवार का उपवास-व्रत करने लगे. किंतु, फिर भी भगवान के दर्शन नहीं हुए. फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी. लोग जो भी पूजा-पाठ, व्रत-उपवास उन्हें बतलाते, अगले ही पल से उसमें लग जाते. और इस तरह उन्होंने सोमवार से लेकर रविवार तक सारे दिनों का उपवास-व्रत रखा, फिर भी भगवान के दर्शन नहीं ही हुए. फिर किसी ने कहा कि नौ दिन दुर्गा का उपवास-व्रत रखो, माता दुर्गा अवश्य प्रसन्न होंगी और तुझे दर्शन देंगी. ईश्वरानन्द जी ने वह भी बड़ी ही भक्ति-भाव से किया, किंतु माता प्रकट नहीं हुईं. फिर वह वैष्णोदेवी गए और वहाँ से बर्फानी बाबा के दर्शन के लिए अमरनाथ भी गए. किंतु उनकी जिज्ञासा शांत नहीं हुई.


तत्पश्चात, लोगों ने उन्हें समझाया कि भगवान से परिचय गुरू करवाता है, इसलिए ऎसे ही भगवान की खोज में भटकने से कोई लाभ नहीं होगा. क्या पता भगवान कभी तुमसे मिले भी हों, लेकिन तुम भगवान को पहचान ही नहीं पाए होगे. क्योंकि बिना गुरू के ज्ञान नहीं मिलता और बिना ज्ञान के भगवान से साक्षात्कार नहीं होता. फिर उन्होंने सोचा कि यह भी सही है, तो चलो पहले गुरू ढूँढ लेते हैं. और अब वह गुरू की खोज में रम गए. इस तरह कई गुरुओं को उन्होंने अपना गुरू माना, मगर हर बार उनकी खोज अपूर्ण रह गई, क्योंकि वे गुरू बड़ी-बड़ी ज्ञान से भरी बातें करते तो थे, भगवान क्या है, यह भी बताते थे, मगर भगवान से साक्षात्कार किसी ने नहीं करवाया. अब उनका मन और जिज्ञासु हो गया. उन्होंने तय किया कि भगवान अगर है, तो अवश्य उसके साथ मेरा साक्षात्कार होगा, और अगर नहीं है, तो मेरे सामने उस रहस्य से परदा उठ जाएगा, जिसके दम पर सारे पूजा,कर्मकांड और आडम्बर होते हैं. और फिर उन्होंने गृहत्याग का कठोर निर्णय लिया. किंतु उनके माता-पिता ने किसी तरह गृहत्याग करने से उन्हें रोक दिया. माता-पिता के रोकने पर वह रुक तो गए, लेकिन भगवान से मिलने की इच्छा उनके मन-मस्तिष्क में सदा चलती रही. और कुछ वर्ष बाद जब उनके माता-पिता स्वर्गवासी हो गए, तब वह घर छोड़कर निकल पड़े.


और अपनी खोज-यात्रा की शुरूआत उन्होंने जाड़े के दिनों में नर्मदा नदी में खड़े होकर नदी को माँ स्वरूप मान उसका आह्वान करने से की. फिर मैहर में माँ शारदा के सामने खड़ा रहकर उनके प्रकट होने का हठ किया. फिर किसी तांत्रिक के कहने पर कि उन्होंने अपनी जीभ काटकर चढ़ाने की तैयारी कर ली, मगर संयोग से इसमें वह कामयाब नहीं हो पाए. फिर उन्होंने कठिन अग्नि साधना की, अग्नि स्नान किया, ठंडे पानी से भरे मटकों से जाड़े में स्नान किया, किंतु ईश्वरानन्द जी को न तो भगवान का दर्शन हुआ न ही कोई ज्ञान प्राप्त हुआ. फिर उन्होंने मौन व्रत आरंभ किया. लोग उन्हें ‘मौनी बाबा’ कहने लगे. फिर वृक्ष के पास खड़े रहने का हठयोग किया. दिनों वृक्ष के नीचे खड़े रहे. लोगों ने ‘खड़ेश्वरी बाबा’ नाम दे दिया. उसके बाद लंबे समय तक कामख्या में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे के श्मशान में रहकर साधना की, लोग ‘श्मशान वाले बाबा’ के नाम से जानने लगे. इस तरह उन्होंने भगवान का दर्शन पाने के सारे टोने, टोटके और कर्मकांड आजमा लिए, किंतु भगवान का दर्शन नहीं ही हुआ. फिर उन्होंने अन्य धर्मों का भी गहराई से अध्ययन किया, मगर किसी भी तरह भगवान से उनका साक्षात्कार नहीं हुआ. उन्हें बस इतना पता चला के लोग बिना भगवान को जाने-समझे-देखे ही उनकी पूजा कर रहे हैं और एक गहरे अंधविश्वास के साथ जीवन जीते आ रहे हैं. फिर एक दिन एक नागा साधु मिले,


तत्पश्चात वह हरिद्वार कुम्भ मेला में १९८६ में पायलट बाबा से मिले और और उनके साथ नैनीताल बाघेश्वर पिंडारी गल्सिएर में वारसो समाधी का ज्ञान प्राप्त किया . आज भी उनके साथ सानिध्य है क्योकि पायलट इस समय विश्वा के महान योगियों में से एक है जिनको जल समाधी भू समाधी ,गिलास समाधी ,परकाया परवेश अन्तर्ध्यान,वाक सीधी समाधान में निपूर्ण है हजारो पुरुष और महिलाओं को समाधी समापन करवा चुके है . भोगांश समाधी भी लगवा चुके है . पायलट बाबा ने खुद बर्फ में ३ महीने तक समाधी कर चुके है . पलट बाबा जल को समाधी और भूमि को समाधी वैज्ञानिक परीक्षण के साथ कर चुके है वैज्ञानिको को भी आश्चर्य ामे दाल दिया था .


और वह आर्यसमाज से जुड़ गए और हिसार (हरियाणा) के ब्रह्मविद्यालय से विधिवत शिक्षा लेना आरंभ कर दिया. यहाँ उन्होंने संस्कृत और वेद का अध्ययन किया और विद्या रत्न तथा विद्या भूषण की उपाधि प्राप्त की. यहाँ आचार्य सत्यप्रिय शास्त्री से उनकी बड़ी घनिष्ठता हो गई. ईश्वरानन्द जी ने उनसे अपने दिल की बात बताई कि वह भगवान से साक्षात्कार चाहते हैं. इसके लिए वह सालों से भटक रहे हैं. शास् शास्त्त्री जी ने फिर उन्हें किसी योगी का सान्निध्य लेने की सलाह दी.
और वह हरिद्वार आ गए. वहाँ उनकी मुलाकात स्वामी डॉ. दिव्यानन्द सरस्वती जी मुलाकात हुई, जिनसे उन्होंने योगविद्या (आसन, प्राणायाम और मेडिटेशन) सीखी. स्वामी दिव्यानंद जी ने ही फिर ईश्वरानन्द जी की भेंट स्वामी सच्चिदानंद जी से करवाई, जिनसे उन्होंने समाधि लगाना सीखा. स्वामी दिव्यानंद जी ने उन्हें शिक्षा पूरी कर लेने की भी सलाह दी, तत्पश्चात ईश्वरानंद जी ने गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार से वेदालंकार और एम ए की उपाधि प्राप्त की. तत्पश्चात वेद रिसर्च स्कॉलर के तौर पर काम करना शुरू किया. उसके बाद भारत सरकार ने उन्हें गोल्ड मेडल से सम्मानित किया. गोल्ड मेडल तत्कालीन प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर जी ने उन्हें अपने शुभ हाथों से दिया.


उसके बाद उन्होंने भगवान को जानने का सूत्र वेद में ढूँढना आरंभ किया. और मार्गदर्शन के लिए उन्होंने स्वामी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी, डॉ. नरेश ब्रह्मचारी, डॉ. जयदेव वेदालंकार, डॉ. रामप्रसाद वेदालंकार, डॉ. आचार्य विजय कुमार, डॉ. आचार्य विद्याभूषण, डॉ. महावीर, डॉ. आचार्य भगवत्दत्त विद्यालंकार, डॉ. आचार्य राजेश जी, योगानन्द डॉ. आचार्य वेदप्रकाश जी, डॉ. ईश्वरानंद, आचार्य मनु महाराज, आचार्य ईश्वरचन्द्र व्याकरणाचार्य, सोमान्द, ब्रह्मानंद, रंजीत मुनि, सत्यानन्द जी, योगी राजपाल, स्वामी विवेकानंद, स्वामी ईश्वरानंद (पटौदी वाले), स्वामी शिवानंद, स्वामी आत्मानंद, आचार्य देशबंधु, आचार्य विश्वानंद जी और आनंदस्वामी का सान्निध्य प्राप्त किया. पतंजलि योगपीठ, योगधाम, ज्वालापुर, हरिद्वार के एक कक्ष में भूमिगत होकर 100 दिनों तक अदृश्य मौन समाधि की. फिर वहीं गंगा नदी के किनारे उन्होंने गायत्री मंत्र का सवा लाख जाप किया. तत्पश्चात, वह ऋषिकेश गए, जहाँ स्वामी योगेश्वरानंद जी से इनकी मुलाकात हुई, जिनसे इन्होंने समाधि प्रक्रिया सीखी. उसके बाद, ईश्वरानंद जी की मुलाकात नीलकंठ उदासीन अखाड़ा के जटाधारी बाबा से हुई. उनसे भी इन्होंने समाधि विद्या सीखी. तत्पश्चात, स्वामी सत्यानंद जी (मुंगेरवाले) से इन्होंने समाधिस्थ होने की साधना सीखी. फिर हरियाणा जाकर बाबा आत्मरामानंद पुरी जी से खेचरी और त्राटक मुद्रा सीखी.


इस तरह उन्होंने अनेक गुरुओं के भगवान नही


अंत में निरंकारी बाबा जी से निराकार का ज्ञान प्राप्त किया


आज भी ये आसन प्राणायाम,परिहार,ध्यान,शामधि का मार्ग दर्शन कर रहे है .